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सोमवार, जून 11, 2012

सर्वोत्तम नाव की ख़ोज

सोनपुर के राजा ने एक बार घोषणा की कि वह उस धर्मं को अपनायेंगे जो सर्वश्रेष्ठ होगा.
राजा के पास हर धर्मं के विद्वान आने लगे.  वह सभी अपने धर्मं के अच्छे गुणों की व्याख्या करते और दूसरे धर्मों की कमियां गिनाते. इस तरह कई लोगों से मिलने के बाद भी राजा असमन्जस में पड़े रहे. कौन सा धर्म उन्हें अंगीकार करना है तय नहीं कर पा रहे थे.
अंत में उन्होंने संत रामदासजी से अपनी शंका का समाधान करने की सोची. चिंतातुर राजा संत के आश्रम में गए.  राजाने रामदासजी से कहा, “ महाराज, में तय नहीं कर पा रहा हूँ कि सबसे अच्छा धर्मं कौनसा है?”
संत बोले, “ राजन, धर्मं वहीं श्रेष्ठ है जो व्यक्ति को उदार और निष्पक्ष बनने की प्रेरणा दे और वह परोपकारी बने.”
राजा प्रभावित हुए, “हाँ, लेकिन में तय नहीं कर पा रहा हूँ कि किस धर्मं को चुनूं?”.
रामदासजी ने उनसे नदी के किनारे चलने का आग्रह किया. तट पर पहुंचने पर वह बोले, “ राजन, हम सबसे श्रेष्ठ नाव में बैठ कर दूसरे किनारे जायेंगे और वहाँ बात करेंगे.
राजा के कर्मचारी तुरंत नाव ले आये. संत ने कहा कि यह काफी पुरानी और रास्ते में टूट सकती है.
कर्मचारी थोड़ी ही देर में नई नाव ले आये.  इस बार संत ने कहा कि इस नाव का तो रंग भी नहीं सूखा है राजा के वस्त्र खराब हो सकते हैं.
इस तरह जो भी नाव आती रामदासजी उसमें कोई ना कोई नुख्स निकाल देते. धीरे धीरे शाम ढल गई. खिन्न हो राजा बोले, “ महाराज, हमें तो उस पार ही जाना है, किसी भी नाव में बैठकर जाया जा सकता है, इस तरह तो समय व्यर्थ जा रहा है.”
संत रामदासजी मुस्कुराये और बोले, “ राजन, बस यही आपको समझना है, कौनसा धर्मं श्रेष्ठ है इस बहस में पड़ने का कोई अर्थ नहीं, सभी धर्मं अच्छे हैं. हमारा लक्ष्य उस पार पहुंचना है जहां हम मनुष्यता, समानता और परोपकार का पालन कर सकें. सभी धर्मं यही सिखाते हैं. लेकिन हम उनमें भी भेदभाव करने लगते हैं.”

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